मैं अपने बचपन से बड़ी ही अजब बात से वास्ता रक्खा हूं। किस्से, कहानियां, फिल्में और लोगों की बातों में प्रेम जो है मात्र एक शब्द है। जिसे लोग अपनी जुबान में अंधा बोलते हैं। कहते हैं यह पागल कर देता है, और पागल खाने में दाखिला करवा देता है।
मैं भी कहानियों से सुन लेता था। लेकिन लगा कि सचमुच ऐसा होता है?
वह सब पागल क्यों नहीं होते जो प्रेम करते हैं?
क्या इसमें भी सच और झूठ है?
जब प्यार में शिद्दत हो और प्यार–प्यार ना रहे तब ही शख्स पागल कहलाया जाता है?
इन तमाम सवालों के बीच से गुजर कर अपनी बचपन की दोस्त ज़ैबा से मैंने सवाल किया… क्या तुमने कभी प्यार किया? फिर अब दूर बैठी मुझ पर पत्थर फेंकते हुए कहती है। तुम पागल हो क्या? बस उसके एक सवाल से मैं पागल हो गया। शायद मुझे प्यार हो गया…
मुझे नहीं पता था कि मैं प्रेम की उस दहलीज को पार कर रहा हूं… जहां से आगे धर्म–जात प्रेम से भी बढ़कर जाने जाते हैं। हैरत है की वह पागल क्यों नहीं होते?
क्या प्रेम में मजहब का जोड़ा जाना इतना जरूरी होता है? क्या प्रेम में दो मजहब मुस्कुरा भी नहीं सकते? क्या प्रेम में मजहब की ऐसी दीवार खड़ी होती है जिसको लांगने की कोशिश करें। तो अपने घर पर आकर नहाना पड़ता है। मेरी उम्र 12 साल है और मैं ज़ैबा के साथ स्कूल जाता हूं। हम दोनों साथ में एक रिक्शे पर बैठकर रोते हुए जाते थे। क्योंकि हमें स्कूल नहीं जाना होता था। इतवार के दिन साथ में पतंग उड़ाते थे। उसके बाद ज़ैबा की अप्पी हमारे लिए आम काट कर लाती है साथ में खिलाती थी। लेकिन आज ज़ैबा को इतना प्रेम से देखा कि उसका फेंका हुआ पत्थर मुझे ज़रा भी नहीं लगा। ऐसा लगा की उसका इशारा हां है और उसका मुझे पागल कहना मेरे प्रेम को स्वीकार रहा था।
वह खिल खिलाकर हंसी और अल्लाह हाफिज बोल कर वहां से चली गई। मैं कुछ देर पेड़ की छांव पर बैठा। उसके चेहरे का इल्यूजन मुझे मुस्कुराने पर मजबूर कर रहा था। धीरे-धीरे वह प्रेम मेरे दिल से निकल कर विवेक पर चढ़ने लगा और मेरी रातों की नींद हराम हो गई। जैसे तैसे दिन कटने लगे मैं और ज़ैबा अब अलग हो चुके थे। हलांकी मैंने कभी ज़ैबा से अपने प्रेम का इज़हार नहीं किया। मैं बस अकेला तन्हा उसकी खुशी में हंसता था। हम दोनों के बीच एक बचपना था। वक्त रहते मैं बहुत सी बातों से परे था। अब बचपने के बीच में मजहब की दीवार खड़ी हो गई थी। वो अलीगढ़ चली गई। मैं अकेला कलकत्ता में रह गया। लेकिन मेरे दिल में प्रेम अनंत भर चुका था। इतना की मैं सचमुच पागल हो गया था। मेरा विवेक प्रेम की खुली किताब था। जिसका एक भी पन्ना खोलो तो उसमें ज़ैबा का ज़िक्र मिलेगा।
मैं सब से कुछ कहना चाहता था। भूख लगती थी ना प्यास लगती थी। मुझे ज़ैबा से मिलना था। समाज के लोग ताने मारने लगे। बावला हो गया लड़का…! मुस्लिम के प्रेम के चक्कर में हैं। जादू टोना कर गई लड़की वो। त्रिवेदी जी आप को कहते थे की अपने बेटे को अंकुश में रखिए। लेकिन नहीं आप कहां जात–पात और धर्म में विश्वास रखने वाले। आप सभी को बराबर समझते थे ना? देख लिया हाल? इस बात की खबर ज़ैबा को मिली। वह वहां रोने लगी। उसका टेलीफोन आता था। लेकिन मेरे घरवाले बात नहीं करने देते थे। मैं बहुत भर चुका था अंदर से। दिन–रात रोता था, तन्हा रहता था। अकेले में बड़बड़ाता था। आखिर में वही पहुंच गया। जहां से मेरा सवाल शुरू हुआ था। “पागलखाना” तीन महीने तक मैं वहा रहा। वहा मुझ जैसे बहुत थे, लेकिन मुझसे अलग। वहां एक शख्स था। जो मेरे पास बैठता था। मैं सारी बातें अंदर की उससे कह देता था और वह कुछ नहीं बोलता क्योंकि वह बहरा था। लेकिन उसी वजह से मैं ठीक हो रहा था। मेरे अंदर का सारा प्रेम शब्दों पर निकल रहा था।
बाद में एक स्तर का पता चला…
जो मेरा प्रेम था वह बचकाना था। उसे मैं दिल में नहीं विवेक पर चढ़ा बैठा था।
प्रेम के तीन प्रकार होते हैं
1. बचकाना प्रेम जो रूह से जुड़ा हुआ होता है, (बचपन का प्रेम)।
2. जिस्म का प्रेम जो हमे जिम्मेदारी का एहसास दिलाता है।
3. विवेक का प्रेम (जिसमे प्रेम नहीं सिर्फ आलोचना और देह का सुख होता है) ये प्रेम की परिभाषा से बिल्कुल परे है और ये प्रेम नाम पर भी धब्बा है।
कलयुग में इसका चलन ज्यादा है।
अंत में मैं इतना ही कहूंगा। प्रेम अनंत है…
गैर मज़हब से प्रेम करना, प्रेम ही है। (लव जिहाद नहीं)
अपने फायदे के लिए प्रेम करना मात्र एक छल है। जो जिंदगी भर तुम्हारी अंतरात्मा को कचोटेगा।
तुम प्रेम हो,
अतः मैं खुबसूरत हूँ . . .
~ अभिजीत🌸
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