
न जाने क्यों तुम्हे
ढूंढने को जी चाहता है।
जैसे कोई बंजारा
रेगिस्तान में,
छांव को तलाशता हो।
तुम बरगद पेड़
के नीचे
छितराई हुई
छांव हो!
जिसकी गोद में,
दो वक्त
सर रखकर
आराम करने का
मन करता है।
मेरे इर्द–गिर्द
जो फूल है बिखरे
उन्हे हथेली में
समेटकर
तुम्हारे पैरों की
पाजेब बनाकर
तुम्हे पहनाने को
दिल चाहता है।
जिनसे मेरी रूह
लिपट कर ज़िंदगी
का जायज़ा करे
कि तुमसे इश्क करना
कितना आसमानी होगा।।
Abhijeet Pandey
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