
एक वक्त कि बात है जब आपत्ति और विपत्ति छुट्टी पर थे , और इस मसले से वो चीन गए हुए थे। बड़ा ही समतिक माहौल था। दोनों भाई साथ मे मजे कर रहे थे। बिना किसी तकलीफ को न्योता देते हुए , जबकि इनका नाम ही आपत्ति और विपत्ति है। सिलसिला बड़ा ही रोचक चल रहा था सबकुछ सामान्य था लेकिन इनकी प्रवृत्ति ही कुछ ऐसी है कि कुछ तो होना ही था…
एक दिन कुछ यूं हुआ कि इनके बीच झगड़ा हो गया। दोनों बड़े ही तमतमाए हुए थे, गैर इरादतन झगड़ा इस बात पर था कि इनमें से बलवान और शक्तिशाली कौन है। दोनों ही बाप , आका मका पड़ाका करने में लगे हुए थे। इतने में दूर खड़े आपदा और विपदा इस झगड़े का लुफ्त उठा रहे थे। क्युकी मैटर थमने का नाम नहीं ले रहा था निरंतर इस बात पर इनकी बहेस ज़्यादा आतुर होने के टीले पर टिकी हुई थी और आपत्ति – विपत्ति अपना विवेक खो बैठे , बात इतनी बढ़ गई कि इन्होंने यह तय कर लिया कि जो ज़्यादा कहर ढयगा वो ही बलवान कहलायेगा , उतने में आपदा – विपदा आते है और जिस अंदाज़ से आ रहे थे, यह समझ आ रहा था कि मैटर लम्बा जाने वाला है।

आपदा विपदा आते है और यह सवाल दाई मारते है कि भईया विपत्ति आपत्ति , कहर ढाने का सेकसन हमारा है ई काम हमारा है। हम लोग के पेट पर कहे लात मार रहे है। अपना झगड़ा अपने तक रखिए हमारे काम मे कबाब कि हड्डी ना बनिए। तब ही आपत्ति और विपत्ति का पारा हाई हो जाता है और कहते है। अबे तुम बौरा गए हो का हिन्दुस्तानी हो तो सम्मान करो हमारा झगड़ा सुलटाने कि बजाय तुम उकसा रहे हो और रही बात कहर ढाने की तो ईका ठेका तुम ही दुइनो लिये हो का बे? ज़्यादा गर्मी ना सवार हो वरना यही दाई मारेंगे तुम दोनो को। तब आपदा विपत्ति से कहते है कि हां हम ईका ठेका लिए है और तुम दोनो ज़्यादा चबर – चबर ना करो वरना यही कबर मे समेट देंगे तुमको, आपत्ति कहता है ज़्यादा बोल रहा है का बे ? बहुत जुबान चल रही है तुम लोगन कि! इधर सुनो छुट्टी मनाने आए हो कायदे से रहो और चलते बनो , भारत में मिलना वहीं ससुर तुम दूइनो को देखत है हम मिलबो कि नाही? इतने में विडंबना दीदी बीच मा आ जाती है और मैटर रफा दफा कराने का प्रयास अपने स्तर से करती है।
विडंबना दीदी कहती है कि दीखो भईया एक ही देश के रहवासी हो कहे झगड़ा कर रहे है? विपदा सवाल करते है , कि श्री मती जी आप कौन है अब? तो विडंबना दीदी कहती है। मेरा नाम विडंबना है, मैं भी यहां चीन में छुट्टी मनाने आई हूं। तुम लोगो को का झगड़ा देख कर मुझे बीच मे आना पड़ा कहे की ऐसी संस्कृति के हिस्सेदार होने के बाद तुम लोग यहां ई रंग दिखा रहे हो शोभा नहीं देता है ना जी। तभी फिर आपदा विपदा कहते कि आप निकालिए यहां से ज़्यादा जज ना बनिए , विपत्ति आपत्ति कहते है, ई का ढंग है बात करने का तमीज नाही है तुम दोनो को कि एक महिला से कैसे बात करते है। आपदा कहता है, अमे जाओ बे तुम लोग झगड़ा कर रहे थे माहौल खराब कर रहे थे ऊपर से हमारे पेट मे लात मारने को तैयारी कर रहे थे और तमीज हमे बता रहे है साले आए बड़े तुर्रम खां जाओ वरना कुछ अनहोनी हो जाएगी। तभी विडंबना दीदी ई बात का विडंबना समझ गई। कहे से कि विडंबना जितनी बड़ी होती है उतनी ही चतुर भी होती है।
सुनो हम तुम लोगो का शंका दूर कर देते है अभी के अभी ज़्यादा चूकिया पंती नाही करो। आज 1 दिसम्बर 2019 है। फेस्टिवल का माहौल है। ई सब ठीक हुई जाए तो खुले मैदान में युद्ध कर लीयो जो जीते यू सबसे बलवान और कलय, प्रलय, कहर जो भी मचानी हो ऊ काम तुम लोगन मे से कोई दो लोगं के हक में आ जाईए बुझे?
तो आपदा समझ गया ई बात को , ठीक है ऐसा ही करते है 5 जनवरी को 2020 को भारत में पहुंचते ही हम विध्वंस का तैयारी शुरू कर देंगे बाकी ई लोग जाने। आपत्ति और विपत्ति भी राजी हो गए। काजी बन के आई विडंबना दीदी प्रलय कि मोहर लगा के चली गई।
दिसम्बर 25 – 2019 , आपदा विपदा अपना काम मे पहले से ही लग गए। अवसर के माहौल मे आपदा ने भारी भरकम बीमारी यानी कि कोरोना को चीन कि सर ज़मीन पर दई मार और चारो विपदाय मच गई। अब ई सब देख आपत्ति और विपत्ति बड़े परेशान कि भईया ई तो खेल हुई गा। चीटिंग है चीटिंग लेकिन ई दुइनों सही समय का इंतजार में लग गए। लेकिन गजब तो तब हुआ जब 2 जनवरी 2020 को आपदा विपदा अपनी टिकट नोएडा के लिए कटा लिए।

इधर मोदी जी चिंतन मे व्यस्त हो गए कि इनको हम छुट्टी मे भेजे चीन उधर ई लोग मिलकर प्रलय मचा रहे है। डर तो ई बात का है कि कहीं बात आगे ना बढ़ जाए और भारत में ये महामारी दस्तक ना दे दे। लेकिन देर आए दुरुस्त आई विडंबना दीदी मोदी जी कि खास एजेंट। मोदी जी को सूचना देती है कि , आपदा – विपदा और आपत्ति – विपत्ति के बीच विध्वंस छिड़ गया है शुरुवात चीन में हो चुकी है। लेकिन गलती ये है कि आपने इन लोगन का रिटर्न टिकट भी करवा रक्खा है। और आपदा विपदा नोएडा में दस्तक दे चुके है। कोरोना का पहला केस वहीं पर है। अब घोर चिंतन मे परधान मंत्री जी।
विपत्ति – आपत्ति कि एंट्री…!

इनकी एंट्री होते ही भारत की जीडीपी सबसे नीचे आ गई और साथ ही साथ जो इकॉनमी ध्वस्त हुई इसका गवाह हर भारतीय है। उनके आते ही सब के चित्त और वित्त हिल गए।लोगो के पैरों तले ज़मीन डगमगा गई, जो मातम छाया चारो ओर लोग भूख से बिलबिला गए , गरीब , किसान, आम आदमी की जेब में चवन्नी नहीं। मिडिल क्लास तो बस कठपुतली बनकर रह गया। इन्होंने सरकार और सरकारी दोनों का नहीं छोड़ा।
सियासत , राजनीति कि नीव चरमरा गई और उसमे भी नमक छिड़कने का काम मीडिया कर रही थी। युद्ध का कोहराम चारों ओर छितराया हुआ था। मोदी जी बड़ी गहरी सोच मे सदमे के साथ डूबे हुए थे। और निरंतर इनके युद्ध में पूर्ण विराम लगाने का प्रयास कर रहे थे।
मार्च का महीना और लोक का लॉक , यानी लॉकडाउन!
युद्ध अपनी तूर पकड़ रहा था। देश-विदेश में मचा कोहराम यकीन नहीं होता था कि इन चार शब्दों ने मिलकर इतना बड़ा प्रलय प्रकोप महामारी मे तब्बदील कर दिया था। दो तीन शब्द तो ऐसे भी आए जिनकी कोई आशंका नहीं थी। जैसे कि “ लॉकडाउन , शोशल डीस्टेंसिंग , वर्चुअल क्लास , वर्क फ्रॉम होम ” इन अंग्रेज़ी शब्दो ने अपना डेरा जमा लिया।
युद्ध ऑन पीक

वक्त यू था कि आपत्ति और विपत्ति , आपदा और विपदा अपनी चरम पर थे। चारों ओर ऐसी की तैसी कर रखी थी। संपूर्ण विश्व में अपना कोहराम मचा दिया आपदा विपदा मिलके महामारी का नंगा नाच कर रही थी। वही दूसरी ओर आपत्ती और विपत्ति संपूर्ण देशों की इकॉनमी घुटनों पर ला रही थी। और एका एक सभी देशों ने अपने घुटने टेक दिए। और प्रयास किया गया आपत्ति और विपत्ति में थोड़ा कंट्रोल लाने सब देश ने अपने अपने तरीके अपने-अपने फलसफे आजमाएं। वही भारत लॉकडॉउन कि स्थिति से गुजर रहा था। श्रमिक, मजदूर दूरदराज के लोग सड़कों पर डेरा जमाए बैठे थे। तो मोदी जी ने की स्कीम निकाली। कि भईया शराब की बिक्री करवाओ और जमकर शराब बिक्री कि कतार में लगी और बिकी। इधर यहां इकॉनमी कंट्रोल हुई और दूसरी तरफ अपने सुपर हीरो सोनू सूद , डॉक्टर , पुलिस अपना कर्तव्य निभा रहे थे। इकोनामी और महामारी मे दोनों पर कंट्रोल पाने की पूरी तैयारी की गई। इनका युद्ध ठंडा पड़ रहा था और धीरे से विपत्ति एक कोना पकड़ती है। और साथ में आपत्ति भी अपने घुटने टेक देता है। और इकॉनमी कंट्रोल हो जाती है। लेकिन आपदा विपदा बड़े तुर्रम खां निकले उन्होंने समझने से इंकार कर दिया और अपनी तूर पर अड़े रहे। और चारों तरफ चुकियाप मचा रक्खा।
शुरू मजबूरी में किए थे , अब मजा आ रहा है।
आपदा विपदा कहते हैं कि , शुरुआत में हमारी नीव मजबूरी पर टिकी थी लेकिन अब आनंद की प्राप्ति हो रही है। प्रचंड चूकियाप मचा हुआ है। इसको तो हमने बढ़ावा दिया ही है , साथ ही साथ इसके हिस्सेदार चुकिया प्रवृत्ति के लोग भी है जो यह समझने को तैयार ही नहीं कि आखिर क्या अनहोनी मची हुई है। भईया हम तो अपना कोहराम जारी रक्खेंगे।
वेद यानी कि संस्कृत पुराण इन शब्दों से कहते हैं। अबे आपदा विपदा रिस्पेक्ट योर फादर। वरना यही तुम दोनो कि फादर मदर कर देंगे। चूकिय कहिंगे साले!!, बेटा हम ही से जन्मे हो कायदा सीखो।
वेद का उजागर होना…!
बोलो अहम ब्रमहास्मी! , मोदी जी पूरे भारत वर्ष कहिए की सबके सब गरम पानी काढ़ा और फल वगैरा ले। गौ मूत्र का सेवन करे। अपने आस पास सफाई रक्खे। हम वेद है हम करते है प्रबंध। और ई अंग्रेज़ी शब्दकोश का विवरण करने बंद करे। शुद्ध हिन्दी जो बहुत होनहार है।
दो गज कि दूरी बहुत है जरूरी।
मस्क लगाओ जीवन बचाओ।
हल्दी को दूध में मिलाकर सेवन करें। साथ मे 3 पहर काढ़ा का सेवन।
सर्वत्र आयुर्वेदिक , बाहर काम निकले घर का शुद्ध भोजन जो स्वास्थ को रक्खे तंदरुस्त।
और सबसे एहेम।
जब तक दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं।
जै राम जी की और वक्त आते – आते आपदा विपदा भी शांत होने कि कगार पर आने लगे।
अभिजीत पाण्डेय
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