
दिया कुछ पल का उजाला…
ज़िन्दगी के एक सिरे के बाद मै अपनी तन्हाई में गुम था, अकेलेपन का अंधेरा मुझे अपना सबसे अजीज़ समझ रहा था। मेरे कहने को दोस्त बहुत से थे लेकिन एक झिझक से तार्रुफ मेरा रोज़ाना होता था। मेरे पास सबकुछ था एक बेहतर घर , एक सफल परिवार हर वक्त अपने भाई को नीचा दिखाने वाली बहन , एक पिता जो सिर्फ पिता ही था वक्त के बदलते वो भी बदल चुके थे और मां जो कभी कभी अपना दुलार मूझपर बरसा देती थी और मै इतनी खुशियों के बावजूद भी अकेले अपने हुज़रे में एकाकीपन का हायल था।
हलांकि मेरी तर्रबियत अकेलेपन में ज़्यादा हुई पांचवी कक्षा से मैं अपने शहर से अंजान एक दूसरे शहर का रहवासी था जो मेरे लिए किसी विदेश से कम नहीं था क्योंकि अकेलेपन से मेरा इतना ज़्यादा ताल्लुक था कि मै मौन हो चुका था नोएडा में अक्सर लड़के मुझे मार दिया करते थे मेरा फ़ोन मेरी पानी की बॉटल लेके चले जाते थे और मै आंसू दबाए हुए वापस घर आ जाया करता था और चुप चाप अपने दर्द को अपने मक्र को अंदर ही समा लेता था क्योंकि कोई पूछने वाला ही नहीं था कि मुझे क्या तक़लीफ है और मै कहता भी किससे? मैंने लिखा न की दोस्त तो बहुत थे लेकिन दोस्त नहीं थे। उन दिनों के अंधेरे में मेरा जागना और दिन में रात का कायल रहना अंदर से खोखला कर चुका था और मै अंदर की भड़ास निकालने का माजूम था तभी से मेरे लेखन की शुरुवात हुई और मैंने अपने अंदर के दर्द को कागज में पिरोना शुरू किया साथ ही साथ मेरे अंदर से शायर का जन्म हो चुका था।
पहली बार अपने मुझे नज़र आए…
नोएडा वाले घर में एक वक्त मेरे साथ कुछ यूं हादसा हुआ कि पिछले कुछ दिनों से मेरे मुख से खून निकल रहा था और मै नज़र अंदाज़ कर रहा था , एक दिन मै अपने घर में बेहोश पड़ा था, मेरे कुछ मित्र मुझे फोन करने की कोशिश कर रहे थे और मेरा कोई जवाब का आसरा उन्हें नहीं दिख रहा था और वो मेरे घर चले आए इत्तेफाक से दरवाज़ा अंदर से लॉक नहीं था उनके 4 बार घंटी बजने के बाद जब दरवाज़ा नहीं खुला और उन्होंने हैंडल घुमाया दरवाज़ा खुला अंदर मेरे कमरे में आए आवाज़ देने हुए ज़ोर शोर से अभिजीत!!! और मेरे कमरे में दाखिल होते ही मुझे बेहोश पाया वो सभी एकदम सकपका से गए मुझे ज़ोर से हिलाए और फिर कुछ मित्रो को फोन किया वो मुझे अस्पताल ले गए और मेरे माता पिता को मेरी खबर दी। कुछ वक्त बाद मेरे माता पिता आ चुके थे और मुझे देख बहुत रों रहे थे डॉक्टर को उम्मीद नहीं थी सभी सेहेम से गए थे। डॉक्टर ने बताया इसे दिल का दौरा पड़ा है साथ ही साथ किसी बात ने इसके दिमाग में गहरा असर डाला है। उसके बाद 2 मह बाद मै अपनी बेहोशी की नींद से जगा…
सबकुछ बदल जाना!
कुछ वक्त बाद सबकुछ बदल चुका था मै अपने घर में वापस आ चुका था सबका अतुल्य प्रेम मुझे मिल रहा था सबकुछ ठीक चल रहा था वो एकाकीपन खत्म हो चुका था लेकिन अकेलापन मेरे हृदय से नहीं निकल पाया मै बाहरवी कक्षा में आ चुका था और मेरा कोई मित्र नहीं था। मेरा इश्क तब तक किताबो से हो चुका था दिन भर मै किताबो मे घुसा रहता था तरह तरह की किताबे पढ़ता था और लेख लिखता था किताबे ही ऐसी थी जो मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। ज़्यादातर मेरा वक्त उन्हीं के साथ बीतता था लेकिन एकाकीपन ज़्यादा बलवान होता है वो मेरे अंदर से निकला ही नहीं मेरी तबियत अक्सर और बिगड़ने लगी थी लेकिन मै सम्हल जाता था। मैंने एक दूसरा ही रास्ता चुना था खुद के लिए।
कॉलेज के दिन मेरी एक नई शुरुवात…
कॉलेज में मै डिबेट में भाग लिया करता था क्योंकि मुद्दे को सही प्रकार से रखना और उसे स्पष्ट करना मुझे बेहतर आता था लेकिन डिबेट में एक अलग मुकाम अपने तरीके को एक नया रूप देकर हासिल किया था। मै अपने अंदर की सारी भड़ास डिबेट में निकालता था और अव्वल आता मुझे कुछ समझ नहीं आता था लेकिन सब कह देता था। नर्वस मै होता ही नहीं था क्योंकि मै पहले ही बहुत कुछ झेल चुका था और अब क्या ही बाकी रह गया था देखना और मेरे इस ही तरीके ने मुझे एक नया मुकाम हासिल करवाया कॉलेज की तरफ से कोई भी डिबेट होती उसमे मेरा ही नाम जाता था और मै ही डिबेट करता था। उसी के साथ साथ मैने बहुत से व्यंग लिखने शुरू किए जो बहुत छपने लगे कॉलेज में मेरा नाम हो चुका था लेकिन अब भी किसी बात की कमी खल रही थी…
वो साल भी आ गया जिसे मुझे नहीं जीना था !
कोरोना काल 2020 जिसकी एहम शुरुवात 21 मार्च से हुई और निरंतर अभी तक जारी है। जहां कोरोना ने बहुत कुछ तहस नहस मचा रक्खा था वहीं मुझे यह मौका खुद को उभारने के लिए सबसे सटीक प्रतीत हो रहा था। मै अपनो के साथ था बहुत अच्छा वक्त गुजर रहा था लेकिन यह महामारी कितनी घातक थी इसका आंकलन मै पहले ही कर चुका था। मै बहुत से बदलाव देख रहा था सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा था। लॉकडाउन एक आपातकाल सा प्रतीत हुआ और उस वक्त मेरी ज़िन्दगी मेरी तकरीर में बहुत से बदलाव रफ्तार के साथ आ रहे थे और उनको बदलने मे मै खुद बहुत प्रयास में लगा था लेकिन यह सब इतना ही नहीं था। एक भयानक दृश्य एक काल जो मेरी ज़िन्दगी उजाड़ने के लिए सामने आ रहा था और सबकी मति ईश्वर ने दबोच राक्खी थी। और वो समय आ गया महामारी ने मेरा परिवार मेरे अजीज़ , खुशियां और मेरे घर के असीम वृक्ष को उजाड़ दिया सब कुछ टूट चुका था, घर बिखर सा गया था और यही ये समय नहीं रुका एका एक 4 झटके यानी 4 परिजन जो मेरे परिवार की अनुपम माटी थे उन्हे माटी में शरीक कर दिया सब बिलबिलाए हुए थे और मै इस सदमे में दबा हुआ था। लेकिन अपने परिवार को सम्हालने का निरंतर प्रयास मै कर रहा था और जैसे तैसे मै गुज़ारा कर रहा था।
तकनीकी दुनिया से दिया का मेरी ज़िन्दगी में उजाला बनकर दस्तक देना…!
मै सोशल मीडिया में ज़्यादा एक्टिव नहीं रहता था इन्हें बस सूचनाओं का जरिया मानता था। ये तो वही बात थी मेरे लिए ” न काहू से दोस्ती न काहू से बैर” इसका लब्बो लियाब कुछ यूं समझा ले की मै किसी से बात नहीं करता था क्योंकी किसी से मुझे ज़्यादा ताल्लुक रखना पसंद ही नहीं था। जब असल ज़िन्दगी में मेरा किसी से इतना लगाव नहीं था फिर तो यह एक तकनीकी दुनिया थी…
लेकिन ऊपरवाले की लीला बड़ी अजाब होती है। उन दिनों बिहार और अमेरिका के चुनाव हो रहे थे। एक दिया की दस्तक मेरे प्रोफ़ाइल में होती है और ग़ैर इरादतन मैने उसे बिहार चुनाव के नतीजे जानने के लिए संदेश भेज दिया पर वो बिहार से ताल्लुक नहीं रखती थी लेकिन मेरी मति ही कुछ यूं बन पड़ी थी और उसका कुछ खास उत्तर भी नहीं आया था लेकिन बहुत दिनों बात किसी को मैने खुद से संदेश भेजा था एक आलोचना का विवरण हुआ भईया जी…! भईया जी! कह कर बात की शुरुवात हुई। परन्तु बात की शुरुवात तब हुई जब मैने एक वीडियो पोस्ट किया और उसे बेहद पसंद आया उसी दिन से बातो की कतार लग गई और देखते ही दिखते वो मेरी अजीज़ दोस्त बन गई। अब लग रहा था जो दुनिया अभी तक मेरी वीरान पड़ी थी वो अब भर चुकी है मेरी दुनिया में एक ऐसी शख्स दाखिल हो चुकी थी जिससे मै एक हिचकी में आपकी सारी दास्तां कह डालता था। मेरा दिन सुहावना गुजरने लगा उसी से मेरी शुरुवात होने लगी थी एक दिन उसके कारण मै बिस्तर से नीचे गिर पड़ा था। देर रात रोज़ रात उससे बाते होती थी, गौरतलब एहम बात वो शादी शुदा थी लेकिन मेरे बेहद करीब थी मेरी सबसे अच्छी दोस्त उसका उजाला मुझे नई ऊर्जा दे रहा था जिससे मै रोज़ प्रकाशित हो रहा था। रोज़ मै उसे अपनी शायरियां सुनता था।
परंतु जैसा की इस कहानी का शीर्षक है ” दिया कुछ पल का उजाला” खुशियों से मेरा बैर बहुत पुराना है और इसमें मेरा इल्म बहुत मुख्तसर है। मेरी ज़िन्दगी में शायद दिया का उजाला बहुत दिन का नहीं रहा है कुछ रंजिशें , झिझक , परेशानियां का उजागर होने लगा और उनसे मेरी बात कम हो गई और यूं ही ठहर सी गई ये पल मेरे सीने को दबोच रहा था कचोट रहा था हर लम्हा लेकिन मै उससे कहने में असमर्थ हूं।
यू उनसे के रोज बात नहीं होती अब, कि रोज बात होती थी तब…!
अब नहीं पता कि क्या गलती की, लेकिन अब नए रिश्ते बनाने से डर लगता है।
अभिजीत पाण्डेय
Leave a comment