
एक मिडिल क्लास के सपने कितने बड़े होते हैं? शायद उसके ख्याल जितने। सच में रोजमर्रा की जिंदगी से तंग आ चुका होता है लेकिन वह अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ ख्यालों में बीतता है। जी हां मैं हूं middle-class का बेटा मेरी कहानी जितनी रूखी है उतनी ही तली भुनी हुई है जिंदगी भर किसी और ख्याल में कटा मेरा हर लम्हा और इस चाहत में कि 1 दिन बहुत बड़ा आदमी बनूंगा लेकिन सिर्फ चाह लेने से अगर सपने पूरे होते हैं फिर क्या था.।
मां हर वक्त चिल्लाती है पिता हर वक्त पढ़ने को कोसता है कभी कभी एक दो चाटे भी पड़ जाते हैं लेकिन क्या मेरी जिंदगी वही है? यह सवाल सोचते सोचते नौवीं कक्षा में आ गया और वहां से बदली ख्यालों की ज़िन्दगी मैं अपने सपनों में ही सबसे बड़ा आदमी बनने की सोच रहा था लेकिन मुझे पता नहीं था मेरी जिंदगी सब ख्याल है और इस छोटे से कस्बे तक ही बसी हुई है। यूपी बोर्ड हिंदी मीडियम के कॉलेज से शिक्षा दीक्षा ले रहा था और कैसे करके दसवीं भी पास कर ली है अब मैं 11वीं में आ गया हूं… बहुत कुछ बदल रहा है मेरी ज़िन्दगी में लेकिन मैं अब भी सोच रहा हूं कि क्या मैं सही कर रहा हूं? मैं अपनी मां और पिता का चेहरा देखते हुए इस भ्रम में दबा हुआ हूं कि 1 दिन कुछ बदलेगा मेरी मां मन्नते मांगती है कि मेरा पढ़ाई में मन लगे लेकिन मैं क्या मैं तो अपने ख्यालों में मग्न हू।
टिक टॉक का जमाना आ गया अब शाहरुख खान की नकल उतारते मैं खुद को स्टार से कम नहीं सोचने लगा था लेकिन एक बात समझ आ रही थी कि यह जो ख्याल है मुझे तबाही का रास्ता दिखा रहे है लेकिन हर एक जवानी के दौर पर होश आना बहुत मुश्किल काम होता है। मैं इस बात में विलीन था पर मेरे सपने भी बदल रहे थे कभी गायक तो कभी एक्टर और मैं अब टिक टॉक पर वीडियो बनाने का ठीक-ठाक पहचान भी हो गई लेकिन क्या मेरे लिए सिर्फ इतना काफी था? बोर्ड की परीक्षाएं आ गई हर बाप चाहता है उसका सुपुत्र पढ़ लिख कर काबिल बने और उसने मेरा फोन ले लिया ख्यालों की दुनिया से बाहर आकर थोड़ा पढ़ाई में मन लगे और 11वीं की परीक्षा में पास हो जाऊं बशर्ते पास ही हो गया बस…।
बारहवीं कक्षा…
सब कुछ बहुत तेजी से बदलाव नए दोस्त बने जो मुझे तरह तरह के भटकाव में शामिल कर रहे थे और मैं शामिल हो गया था। उनकी झूठी दिलासा सातवें आसमान में चढ़ा रही थी और पूरा साल अपनी ही मगन में चूर रहकर मैंने गवा दिया अभी लग रहा था सचमुच बहुत बड़ा खिलवाड़ किया बोर्ड की परीक्षाएं उस बीच पिता को मेरी कुछ आदतों के बारे में पता चला लेकिन पिता है वो मुझे मार कूट कर समझा फुसलाकर आगे बढ़ने की हिदायत दी। उस बीच मेरा ध्यान ईश्वर की तरह बहुत ज्यादा ही केंद्रित था और मैं हर रोज मंदिर की दहलीज पर जाता और यह सवाल करता क्या मैंने अभी तक जो किया सही किया ईश्वर के सामने रोता कोसता और मुझको आत्मबल देने की ख्वाहिश रखता क्योंकि मुझे समझ में आ गया था कि मेरे ख्यालों की दुनिया मुझे ज्यादा दूर तक नहीं ले जाएगी क्योंकि चौक पढ़ लिख कर लोग चांद पहुंच जाते है पर मैं तो अभी तक ख्यालों में ही चूर था। खैर देर आए दुरुस्त आए और मुझे समझ आ चुका था कि ख़यालो से चांद तक तो नहीं पहुंचा जा सकता उसके लिए फिजिक्स का ज्ञान होना जरूरी था। और ज्ञान तब होता जब उसे अध्ययन करा जाए। मैंने दिन-रात की मेहनत से इधर उधर की कोचिंग में ठोकर खाकर मैंने अपने आप को मजबूत किया और दिन रात के परिश्रम से 12वीं की परीक्षा दी जाहिर है परिणाम अच्छा ही आना था गणित में थोड़ा कम अंक थे लेकिन फिजिक्स केमिस्ट्री में 80 के ऊपर अंक अर्जित करें और मुझे मेरी मार्ग दिशा प्राप्त हो चुकी थी।
मैंने निश्चय करा पढ़ लिख कर एक मुकाम हासिल करना है ख्यालों की दुनिया से बाहर आकर उस चांद जैसे ख्याल को छूना है जहां लोग पढ़ लिखकर पहुंचते हैं। यकीनन मै आज चांद पर तो नहीं हूं लेकिन जहां भी हूं दुरुस्त हूं क्योंकि मेरा इश्क पढ़ाई से हो गया और हर वक्त यह सवाल तैरने लगा कि मैं क्या सफल हो जाऊंगा। इसके लिए मेरे माता-पिता ही काफी है। दिशा वो निर्धारित कर रहे थे मार्ग पर चलना मुझे था। और मैं भटका मुसाफिर आज पढ़ाई के दम पर अपनी दिशा पर चल पड़ा हूं और मुझे गर्व है कि मेरी दिशा सही है अभी तो कुछ नहीं लेकिन एक स्टॉप जल्दी आने वाला है। मेरा मुकाम मेरा चांद मेरी मंज़िल…।
[ व्यंग – अभिजीत पाण्डेय ]
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