भारत में कुल 3 करोड़ 80 लाख केस पेंडिंग है और उनमें से 2 करोड़ 60 लाख नारी शोषण, स्त्री के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार के केस पेंडिंग है। तो क्या इसमें हम सरकार को दोष दे यह सिस्टम को?
दोष खुद को दो की भारत जैसे देश की संस्कृति के हिस्सा होने के बाद जहा औरत को देवी समान पूजते है लेकिन क्या हम सिर्फ पूजते ? या उस नज़र से देखते भी है?
कभी आसिफा , निर्भया , डॉ प्रियंका रेड्डी और अब मनीषा।
इसमें मजहब की ज़ंज़ीर न साधो न ही किसी को दोष दो खुद से पूछो क्या तुम इंसान हो? गैर इंसानियत तो देखो इस कदर मनीषा के साथ सुलूक हुआ और पुलिस मनीषा से बयान चाहती थी , इतना देखकर भी यह आभास नहीं हुआ कि कितनी हैवानियत के साथ उसकी यह हालत हुई है। लेकिन क्या कहे यह हिन्दुस्तान जहां बड़े तब्गे के लोगो की खबर सनसनी पकड़ती है और उसके बाद देश में क्या चल रहा है भुखमरी , सूखा बेरोजगारी कोई मतलब नहीं लेकिन छोटे कद के पत्रकार कभी कभी एहेम किरदार निभा जाते है। मनीषा को इंसाफ मिलेगा लेकिन उससे पहले ये समझो कब तक ऐसे पोस्ट लिखोगे?
फलाने को न्याय , बलात्कारों को सज़ा दो।
या फिर सड़क पर मोमबत्ती लेकर उतरोगे नारे लगाओगे और तब तक जब तक मोमबत्ती की लौ बुझ नहीं जाति? और फिर सब भूल जाते हो?
हादसे तब तक नहीं होते जब तक हम उसे होने नहीं देते..!
किसी पे सवाल खड़े करने से पहले खुद पे विचार करे।
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